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बहार और मैं – वफ़ा बराही की नज़्म

बहार-दर-बहार है
चमन में ये पुकार है
फ़ज़ा-ए-मुर्ग़-ज़ार है
हवा-ए-ख़ुश-गवार है
चलो चलो उमंग में
बढ़ो बढ़ो तरंग में

गुलों पे इक निखार है
ज़मीन लाला-ज़ार है
ख़याल शो’ला-बार है
निगाह बे-क़रार है
बहार गो है जोश पर
ख़िज़ाँ है उस के दोष पर

जो बहर है ख़ुश-आब है
वो ख़ुश है जो हबाब है
समाँ ही ला-जवाब है
सुकूँ में इज़्तिराब है
निखार है सिंगार है
उभार ही उभार है

न कोई राज़दार है
न कोई ग़म-गुसार है
न दिल पे इख़्तियार है
न जी का ए’तिबार है
अजीब मेरा हाल है
कि ज़िंदगी वबाल है

चमन है सारा ख़ंदा-ज़न
तुयूर सब हैं नग़्मा-ज़न
खड़ी हुई है हर फबन
ख़िज़ाँ का पहने पैरहन
रहेगा हुस्न-ए-दह्र क्या
न ढाएगा ये क़हर क्या

न दिल का इंतिख़ाब है
न कोई बे-हिजाब है
न आलम-ए-शबाब है
जो देखता हूँ ख़्वाब है
जहान को बक़ा कहाँ
करम कहाँ वफ़ा कहाँ

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By: Vafa Barahi

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