Categories: नज़्म

प्यास – ख़ुर्शीद-उल-इस्लाम की नज़्म

Published by
Khurshid-ul Islam

दूर से चल के आया था मैं नंगे पाँव नंगे सर
सर में गर्द ज़बाँ में काटने पाँव में छाले होश थे गुम
इतना प्यासा था मैं उस दिन जितना चाह का मारा हो
चाह का मारा वो भी ऐसा जिस ने चाह ने देखी हो

इतने में क्या देखा मैं ने एक कुँआ है सुथरा सा
जिस की मन है पक्की ऊँची जिस पर छाँव है पेड़ों की
चढ़ कर मन पर झाँका मैं ने जोश-ए-तलब की मस्ती में
कितना गहरा इतना गहरा जितनी हिज्र की पहली रात
कैसा अंधा ऐसा अंधा जैसी क़ब्र की पहली रात

कंकर ले के फेंका तह में
पानी की आवाज़ न आई
उस का दिल भी ख़ाली था

1
Published by
Khurshid-ul Islam