गीत

बाँसुरी – किशोर काबरा की कविता

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Kishor Kabra

टूट जाएगी तुम्हारी साँस री!
ओंठ पर रख लो हमारी बाँसुरी।
सात स्वर नव द्वार पर पहरा लगाए,
रात काजल आंख में गहरा लगाए।
तर्जनी की बाँह को धीरे पकड़ना,
पोर में उसके चुभी है फाँस री!
ओंठ पर…

दोपहर तक स्वयं जलते पाँव जाकर,
लौट आई धूप सबके गाँव जाकर।
अब कन्हैया का पता कैसे लगेगा?
कंस जैसे उग रहे है काँस री!
ओंठ पर…

बह रहा सावन इधर भादव उधर से,
कुंज में आएं भला माधव किधर से?
घट नहीं पनघट नहीं, घूंघट नहीं है,
आँसुओं से जल गए हैं बाँस री!

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Kishor Kabra