कविता

जिसे ढहाया नहीं जा सका

Published by
Kumar Ambuj

जिसे तुमने सचमुच गोली मार ही दी थी
वह अब भी मुसकराता है तुम्हारे सामने दीवार पर
तुम्हारे छापेख़ाने उसी की तस्वीर छापते हैं
तुम दूसरे द्वीप में भी जाते हो तो लोग तुमसे पहले
उसके समाचार पूछते हैं तब लगता है तुम्हें
कि दरअसल तुम मरे हुए हो और वह ज़िन्दा है

बुदबुदाते हुए हो सकता है तुम ग़ाली देते हो मन में
लेकिन हाथ जोड़कर फूल चढ़ाते हो और फोटू खिंचाते हो
तुम शपथ लेते हो वह सामने हाथ उठाए दिखता है
तुम झूठ बोलते हो वह तुम्हारे आड़े आ जाता है
घोषणापत्र में तुम विवश दोहराते हो उसी की घोषणाएँ

अब तुमने ढहा दी है उसकी मूर्ति तो देखो
सब तरफ़ सारे सवाल उसी मूर्ति के बारे में हो रहे हैं
बार-बार दिखाई जा रही हैं उसी मूर्ति की तस्वीरें
उसी चौराहे पर इकट्ठा होने लगे हैं तमाम पर्यटक
जिन्हें बताया जाता है कि यहाँ, यहीं, हाँ, इसी जगह,
वह मूर्ति थी।

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Kumar Ambuj