नज़्म

क्यूँकर – वफ़ा बराही की नज़्म

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Vafa Barahi

लगी आग दिल की बुझाएँगे क्यूँकर
तबीअत को रस्ते पे लाएँगे क्यूँकर
जो बे-दर्द हैं रहम खाएँगे क्यूँकर
वो भूले से घर मेरे आएँगे क्यूँकर
बला से कोई इश्क़ में ख़ार भी हो
ग़म-ओ-रंज-ए-पैहम से नाचार भी हो
सलामत रहें दिल के तड़पाने वाले
तमन्नाएँ मेरी न बर लाने वाले
सवाल-ए-मोहब्बत को ठुकराने वाले
न पास आने वाले न काम आने वाले
उन्हें क्या त’अल्लुक़ फ़ुग़ाँ-ओ-बुका से
फ़क़त काम रहता है क़हर-ओ-जफ़ा से

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