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क़सम – वफ़ा बराही की नज़्म

क़सम खाता हूँ मैं हिन्दोस्ताँ की शान-ओ-शौकत की
क़सम खाता हूँ हिम्मत की दिलेरी की शुजाअ’त की
क़सम खाता हूँ ऐ भारत तिरी अगली हिकायत की
क़सम खाता हूँ ऐ ग़ैरत तिरी पुर-जोश जुरअत की

कि अपनी अज़्मत-ए-ख़ुफ़्ता को नेज़ों से जगा दूँगा
मज़ा बे-जा जसारत का हरीफ़ों को चखा दूँगा
ग़ज़ब की बिजलियाँ बन कर मुख़ालिफ़ को जला दूँगा
नई दुनिया नया आलम नई बस्ती बसा दूँगा

क़सम खाता हूँ भारत के जवानों की जवानी की
क़सम खाता हूँ मैं सुब्ह-ए-वतन की शादमानी की
क़सम खाता हूँ मैं फ़त्ह-ओ-ज़फ़र की कामरानी की
क़सम खाता हूँ मैं गंग-ओ-जमन की भी रवानी की

सिपाही सूरमा बन कर अभी मैदाँ में जाता हूँ
कमर में तेग़-ए-हिन्दी हाथ में नेज़ा उठाता हूँ
कमाँ को खींचता हूँ बान अर्जुन का चलाता हूँ
ग़रज़ यूँ दुश्मनों के ख़ून की नद्दी बहाता हूँ

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By: Vafa Barahi

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