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मालन – वफ़ा बराही की नज़्म

इक जा रही है मालन फूलों का हार ले कर
गुलशन का हुस्न ले कर दिल का क़रार ले कर
जोश-ए-नुमू का आलम रुख़्सार मेहर-ए-ताबाँ
माथे पे सुर्ख़ टीका मानिंद-ए-सुब्ह-ए-ख़ंदाँ
कानों के ज़र्द बुंदे रक़्साँ थे इस अदा से
पर्बत की जैसे तितली मौज-ए-हवा से खेले
पैरों में डाले छागल हाथों में पहने जोशन
बिखरी थीं ऐसी ज़ुल्फ़ें बल खाए जैसे नागन
आँखों में हुस्न-ए-मस्ती इक कैफ़-ए-ख़ुद-नुमाई
क़दमों में शान-ए-लग़्ज़िश गोया कोई शराबी
मौज-ए-नशात-ए-रंगीं नाज़ुक अदा में पिन्हाँ
नुज़हत हया की लर्ज़ां काफ़िर शबाब-ए-नाज़ाँ
सरशार था ज़माना मदहोश थी ख़ुदाई
कैसा लिहाज़-ए-तक़्वा क्या ज़िक्र-ए-पारसाई
मद्धम सुरों में फ़ितरत कुछ गुनगुना रही थी
नाज़-ओ-अदा की देवी बंसी बजा रही थी
हसरत भरी नज़र से मैं उस को तक रहा था
सारी फ़ज़ा पे क़ब्ज़ा हुस्न-ओ-जमाल का था

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By: Vafa Barahi

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