शेर

हफ़ीज़ जालंधरी के चुनिंदा शेर

Published by
Hafeez Jalandhari

यरान-ए-बे-बिसात कि हर बाज़ी-ए-हयात
खेले बग़ैर हार गए मात हो गई


ना-कामी-ए-इश्क़ या कामयाबी
दोनों का हासिल ख़ाना-ख़राबी


अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल
कौन तिरी तरह ‘हफ़ीज़’ दर्द के गीत गा सके


फिर दे के ख़ुशी हम उसे नाशाद करें क्यूँ
ग़म ही से तबीअत है अगर शाद किसी की


वफ़ा का लाज़मी था ये नतीजा
सज़ा अपने किए की पा रहा हूँ


आने वाले किसी तूफ़ान का रोना रो कर
ना-ख़ुदा ने मुझे साहिल पे डुबोना चाहा


मिरे डूब जाने का बाइस न पूछो
किनारे से टकरा गया था सफ़ीना


आशिक़ सा बद-नसीब कोई दूसरा न हो
माशूक़ ख़ुद भी चाहे तो उस का भला न हो


ख़ामोश हो गईं जो उमंगें शबाब की
फिर जुरअत-ए-गुनाह न की हम भी चुप रहे


क़ाएम किया है मैं ने अदम के वजूद को
दुनिया समझ रही है फ़ना हो गया हूँ मैं


856

Page: 1 2 3 4 5 6 7 8

Published by
Hafeez Jalandhari