loader image

हफ़ीज़ जालंधरी के चुनिंदा शेर

इरादे बाँधता हूँ सोचता हूँ तोड़ देता हूँ
कहीं ऐसा न हो जाए कहीं ऐसा न हो जाए


दोस्तों को भी मिले दर्द की दौलत या रब
मेरा अपना ही भला हो मुझे मंज़ूर नहीं


क्यूँ हिज्र के शिकवे करता है क्यूँ दर्द के रोने रोता है
अब इश्क़ किया तो सब्र भी कर इस में तो यही कुछ होता है


कोई चारह नहीं दुआ के सिवा
कोई सुनता नहीं ख़ुदा के सिवा


वफ़ा जिस से की बेवफ़ा हो गया
जिसे बुत बनाया ख़ुदा हो गया


‘हफ़ीज़’ अपनी बोली मोहब्बत की बोली
न उर्दू न हिन्दी न हिन्दोस्तानी


ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है
बात होती है मगर बात नहीं होती है


देखा जो खा के तीर कमीं-गाह की तरफ़
अपने ही दोस्तों से मुलाक़ात हो गई


हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके
तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके


दिल लगाओ तो लगाओ दिल से दिल
दिल-लगी ही दिल-लगी अच्छी नहीं


856

Add Comment

By: Hafeez Jalandhari

© 2022 पोथी | सर्वाधिकार सुरक्षित

Do not copy, Please support by sharing!