तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन
किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके
मुझ को न सुना ख़िज़्र ओ सिकंदर के फ़साने
मेरे लिए यकसाँ है फ़ना हो कि बक़ा हो
उतरेंगे किस के हल्क़ से ये दिल-ख़राश घूँट
किस को पयाम दूँ कि मिरे साथ आ के पी
उठ उठ के बैठ बैठ चुकी गर्द राह की
यारो वो क़ाफ़िले थके हारे कहाँ गए
मेरी क़िस्मत के नविश्ते को मिटा दे कोई
मुझ को क़िस्मत के नविश्ते ने मिटा रक्खा है
दिल ने आँखों तक आने में इतना वक़्त लिया
दूर था कैसे ये बुत-ख़ाना अब मालूम हुआ
मबादा फिर असीर-ए-दाम-ए-अक़्ल-ओ-होश हो जाऊँ
जुनूँ का इस तरह अच्छा नहीं हद से गुज़र जाना
तन्हाई-ए-फ़िराक़ में उम्मीद बार-हा
गुम हो गई सुकूत के हंगामा-ज़ार में
हमेशा के लिए ख़ामोश हो कर
नई तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ वाले ने मारा