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ज़िन्दगी – कुँवर बेचैन की कविता

दुख ने तो सीख लिया आगे-आगे बढ़ना ही
और सुख सीख रहे पीछे-पीछे हटना
सपनों ने सीख लिया टूटने का ढंग और
सीख लिया आँसुओं ने आँखों में सिमटना
पलकों ने पल-पल चुभने की बात सीखी
बार-बार सीख लिया नींद ने उचटना
दिन और रात की पटरियों पे कटती है
ज़िन्दगी नहीं है, ये है रेल-दुर्घटना।

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By: Kunwar Bechain

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