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इंक़लाब – ज़फ़र अली ख़ाँ की नज़्म

बारहा देखा है तू ने आसमाँ का इंक़लाब
खोल आँख और देख अब हिन्दोस्ताँ का इंक़लाब
मग़रिब ओ मशरिक़ नज़र आने लगे ज़ेर-ओ-ज़बर
इंक़लाब-ए-हिन्द है सारे जहाँ का इंक़लाब
कर रहा है क़स्र-आज़ादी की बुनियाद उस्तुवार
फ़ितरत-ए-तिफ़्ल-ओ-ज़न-ओ-पीर-ओ-जवाँ का इंक़लाब
सब्र वाले छा रहे हैं जब्र की अक़्लीम पर
हो गया फ़र्सूदा शमशीर-ओ-सिनाँ का इंक़लाब

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By: Zafar Ali Khan

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