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उठने को तो उट्ठा हूँ महफ़िल से तिरी लेकिन

उठने को तो उट्ठा हूँ महफ़िल से तिरी लेकिन
अब दिल को ये धड़का है जाऊँ तो किधर जाऊँ

मरना मिरी क़िस्मत है मरने से नहीं डरता
पैमाना-ए-हस्ती को लबरेज़ तो कर जाऊँ

तू और मिरी हस्ती में इस तरहा समा जाए
मैं और तिरी नज़रों से इस तरहा उतर जाऊँ

दुनिया-ए-मोहब्बत में दुश्वार जो जीना है
मर कर ही सही आख़िर कुछ काम तो कर जाऊँ

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By: Hadi Machlishahri

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