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रंगों की बारिश में भीगी हुई

सुनीता वर्मा-
इस नाम को मैं
दोहराता हूं मन ही मन
और भर जाता हूँ खुशी से-
मेरे ही शहर में रहती है
जो रंगों को छेड़कर
रंगों से खेलकर
चित्र ही नहीं बनाती
बल्कि रंगों से जीवन रचती है
रचती है जीवन का सौन्दर्य
सौन्दर्य का जीवन
जीवन में सौन्दर्य
सौन्दर्य में जीवन
कल्पना करता हूँ मैं
कागज और कैनवास पर
सार्थक, सजीव, और जीवन्त उपस्थिति के लिये अपनी
कितनी बेचैनी से टहलते होंगे रंग
उसके मन में, मस्तिष्क में
कूंचियों का भी होता होगा
लगभग यही हाल
उनकी नाजुक और मुलायम उंगलियों के सहारे
रंगों में डूबकर
थिरकने, फुदकने, नाचने की चाह में
रंगों की बारिश में
भीगी हुई एक कलाकार
डूबी हुई उनकी गहराईयों में
उनके स्वभाव के अनुसार
अपनी तमाम खामोशियों
और एकाग्रता के साथ
उनसे बोलती बतियाती
उनकी अपनी भाषा में
इस समय भी भीगी हुई है वह
जबकि आई है मुझसे मिलने
छोड़कर अपने कला कक्ष में
रंगों का समुद्र
जिसकी चंचल लहरें
पुकार रही हैं उसे लगातार
मैं पूछता हूं
और चहक उठती है वह-
हर रंग का अपना स्वभाव होता है
जैसे हर मनुष्य की अपनी आदतें
जैसे ‘रसों’ के अपने गुण
हर रंग का स्वाद भी होता है अपना
जिसे कम से कम जीभ से चखकर
जान पाना मुश्किल है
सुखद आश्चर्य से भर जाता हूँ मैं
कि उन्हें देखकर
उनसे मिलकर
उनसे बातचीत कर
जान पाना बहुत मुश्किल है
कि वे चित्रकार हैं
क्योंकि जिन रंगों में उलझी रहती हैं
भीगी रहती हैं जिन रंगों की बारिश से
उन रंगों के छींटे
दिखाई ही नहीं देते
उनके पूरे व्यक्तित्व के
किसी भी हिस्से में
बहुत देर तक बच पाना
बहुत मुश्किल है
उनके व्यक्तित्व की शालीनता
पहनावे की सादगी
बातों की मिठास
संगीतमय हंसी की खनक
और उनकी दो खूबसूरत
निर्दोष और समझदार
कुछ तलाशती सी
बेचैन आंखों के प्रभाव से
जिनमें रंग तैर रहे हैं या स्वप्न
यह भी कह पाना मुश्किल है
इस छोटी सी मुलाकात में
कहता हूँ मैं अपने आप से
इसीलिए तो सुनीता वर्मा है वह-
रंगों के सम्मोहन
और तिलस्म में प्रवेश कर
उसे तोड़ती है
और फिर रचती है उन्हीं से
एक तिलस्म, एक सम्मोहन
बिल्कुल वैसा ही!
उनके रचे हुए पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं होते
उनके खिलाये हुए फूल सिर्फ फूल
बनायी हुई चिड़िया सिर्फ चिड़िया नहीं होती
नाचते हुए लोग सिर्फ लोग
उनके द्वारा खोली गई खिड़की सिर्फ खिड़की नहीं होती
खिड़की के पार होता है पूरा जीवन
होता है जीवन और सौन्दर्य का विराट संसार
होती हैं उम्मीदें,
स्वप्न, इच्छायें
यथार्थ के अच्छे बुरे अनुभव और दृश्य
हां हां यही तो जादू है उनका
कि उनके हाथ लगाने के बाद
पेड़ और फूल, भूल जाते हैं मुरझाना
चिड़िया उड़ना, खिड़की बंद होना
और नाचते हुए लोग विश्राम करना
बहरहाल
हमें प्रेम और समर्पण उस तरह करना चाहिए
जिस तरह सुनीता वर्मा
जिस प्रकार रंग बिखरे होते हैं
उनके चारों ओर
जिस तरह बिखरी होती हैं वे
रंगों के इर्द-गिर्द
प्रेम और समर्पण में हमें
कुछ उसी तरह बिखरना चाहिए।

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By: Kamleshwar Sahu

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