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मृत्युलोक और कुछ पंक्तियाँ

इसी संसार की भीड़ में दिखा वह एक चेहरा, जिसे भूला नहीं जा सकता।
तमाम मुखौटों के बीच सचमुच का चेहरा।
या हो सकता है कि वह इतने चेहरों के बीच एक शानदार मुखौटा रहा हो।
उस चेहरे पर विषाद नहीं था जबकि वह इसी दुनिया में रह रहा था।
वहाँ प्रसन्नता जैसा कुछ भाव था लेकिन वह दुख का ठीक विलोम नहीं था।
लगता था कि वह ऐसा चेहरा है जो प्रस्तुत दुनिया के लिए उतना उपयुक्त नहीं है।
लेकिन उसे इस चेहरे के साथ ही जीवन जीना होगा। वह इसके लिए विवश था।
उसके चेहरे पर कोई विवशता नहीं थी, वह देखने वाले के चेहरे पर आ जाती थी।
वह बहुत से चेहरों से मिल कर बना था।
उसे देख कर एक साथ अनेक चेहरे याद आते थे।
वह भूले हुए लोगों की याद दिलाता था।
वह अतीत से मिलकर बना था, वर्तमान में स्पंदित था
और तत्क्षण भविष्य की स्मृति का हिस्सा हो गया था।
वह हर काल का समकालीन था।
वह मुझे अब कभी नहीं दिखेगा। कहीं नहीं दिखेगा।
उसके न दिखने की व्यग्रता और फिर उत्सुकता यह सम्भव करेगी
कि वह मेरे लिए हमेशा उपस्थित रहे।
उसका ग़ुम हो जाना याद रहेगा।
यदि वह कभी असम्भव से संयोग से दिखेगा भी तो उसका इतना जल बह चुका होगा
और उसमें इतनी चीज़ें मिल चुकी होंगी कि वह चेहरा कभी नहीं दिखेगा।
हर चीज़ का निर्जलीकरण होता रहता है, नदियों का, पृथ्वी का और चन्द्रमा का भी।
फिर वह तो एक कत्थई-भूरा चेहरा ही ठहरा।
उसे देख कर कुछ अजीवित चीज़ें और भूदृश्य याद आए। एक ही क्षण में:
लैम्पपोस्टों वाली रात के दूसरे पहर की सड़क।
कमलगट्टों से भरा तालाब।
एक चारख़ाने की फ्रॉक।
ब्लैक एंड व्हाईट तसवीरों का एलबम।
बचपन का मियादी बुख़ार।
स्टूल पर काँच की प्लेट और उसमें एक सेब।
एक छोटा-सा चाकू।
छोटी-सी खिड़की।
और फूलदान।
उस स्वप्न की तरह जिसे कभी नहीं पाया गया।
जिसे देखा गया लेकिन जिसमें रहकर कोई जीवन सम्भव नहीं।
कुछ सपनों का केवल स्वप्न ही सम्भव है।
वह किसी को भी एक साथ अव्यावहारिक, अराजक,
व्यथित और शान्त बना सकता था।
वह कहीं न कहीं प्रत्यक्ष है लेकिन मेरे लिए हमेशा के लिए ओझल।
कई चीज़ें सिर्फ़ स्मृति में ही रहती हैं।
जैसे वही उनका मृत्युलोक है।

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By: Kumar Ambuj

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