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दागो, भागो – शैल चतुर्वेदी की कविता

दुश्मन
हथियार मांग लाया दान में
आ गया मैदान में
हाथ बढ़ाकर दोस्ती का
छेड़ दी लड़ाई
अकारण ही भारत पर
कर दी चढ़ाई
तो देश के बूढ़े और जवान
पंजाबी, मरहठे, पठान
आ गए होश में
तो हम भी
भनभनाने लगे जोश में
सेना में भरती होने का
हो आया चाव
आव देखा न ताव
और पत्नी के सामने
रख दिया प्रस्ताव
कहने लगी – “क्या बोलते हो
अपने को सैनिक से तौलते हो
अरे, बहादुरी ही दिखानी था
तो शादी क्यों की
मेरी बरबादी क्यों की
क्या घर में लड़ते-लड़ते
जी नहीं भरा
जो इरादा है
बाहर लड़ने का
क्या फायदा
बी.ए. तक पढ़ने का
लड़ाई में वो जाते हैं
जिनका कोई नहीं होता
चले भी गए
तो उनके लिए कोई नहीं रोता
जिनको लड़ना है लड़े
हमें नहीं लड़ना
अच्छा नहीं है
किसी के बीच में पड़ना।”

मगर हमारा जोश
जोर मार रहा था
कर्तव्य पुकार रहा था
हम बोले- “क्या कहती हो
देश पर संकट है
कहाँ रहती हो
दुश्मन
बारूद उगल रहा है
हिमालय जल रहा है
देश पर बिजली कौंध रही है
हैवानियत
इंसानियत को रौंद रही है
शत्रु बात-बात पर
अड़े जाता है
देश पर अपने चढे़ जाता है
लगातार बढ़े जाता है
बावरी!
यहाँ तक आ पहुँचा तो क्या करोगी
फिर तो लड़ोगी
उसे वहीं रोकना अच्छा है
देखती नहीं
जाग गया देश का बच्चा-बच्चा है।”
वे बोली-“जानती हूँ
मगर तुम बच्चे नहीं हो
तुम्हारे कन्धों और ज़िम्मेदारी है
पीछे पांच बच्चे हैं
एक नारी है
घर में लड़ लेते हो
तो क्या ये समझते हो
कि फौज से लड़ना आसान है
इसका भी कुछ भान है
मुंह चलाने
और बन्दूक चलाने में
अंतर है ज़मीन-आसमान का
फिर कुछ तो खयाल करो
आने वाले मेहमान का
दुश्मन पीछे लग गया
तो भागते बनेगा
बन्दूक चलाई है कभी
गोलियाँ दागते बनेगा?
बन्दूक-बन्दूक है
गुलेल नहीं है
लड़ाई, लड़ाई है
खेल नहीं है।”

हमसे न रहा गया
कह दिया जो भी कहा गया-
“मेरे पौरूष पर शंका करती हो
मुझे क्या समझ रक्खा है
लोहे का चना हूँ
तुमने समझा, मुन्नका है
कि हर कोई चबा ले
आसानी से दबा ले
जानती हो
स्कूल मे एन.सी.सी. ली थी
और फायरिंग भी की थी
निशानेबाज़ी में इनाम पाया था
पेपरों में नाम आया था।”

वे बोलीं-“बस-बस रहने दो
देख ली तुम्हारी निशानेबाज़ी
सुई मे धागा ड़ालने को कहा
तो ड़ालना दूर रहा
सुई गुमा दी
उस दिन लकड़ी फ़ाड़ने को कहा
तो कुल्हाड़ी
पैर पर दे मारी थी
और बैल्ट समझकर
खूंटी से छड़ी उतारी थी
सी.सी. बीसी(एन.सी.सी नहीं) को
गोली मारो
नहाओ, धोओ
और दफ्तर पधारो।”

इतना तगड़ा तर्क सुनकर
भला क्या बोलते
न जाने और क्या सुनना पड़ता
जो मुंह खोलते
हमने सोचा-
(उलझना ठीक नहीं
पर स्वयं को
कमज़ोर समझना भी ठीक नहीं)
भोजन किया
और चल दिये दफ्तर को
तभी रेस्ट हाऊस के सामने
फौजी लिबास में
खड़े देखा पड़ोसी अख़्तर को
हमारा पौरूष जाग उठा
देश के प्रति अनुराग जाग उठा
फौजी कैंप में जा पहुँचे
मगर माप-तौल करने वाले
अफसर को नहीं जंचे
बोला-“कमर छयालीस है
और सीना बयालीस
वज़न ज़रूरत से ज्यादा है
नौजवान नहीं दादा है।”

हमने हाथ जोड़कर कहा-
“सिपाही जी,
यह फौजी भरती है
या मिस इंडिया का चुनाव है
ले लीजिए न
मुझे बड़ा चाव है।”
वह बोला-“बहस मत करो जी
लड़ना
तुम्हारे बस की बात नहीं
हमें फौज ले जाना है
बारात नहीं।”

उसने अफसर को दी रिपोर्ट
अफसर बहादुर था
हमको ही किया सपोर्ट
बोला-“सात दिन परेड करेगा
तो शेप में आ जाएगा
फिर कुछ तो काम आएगा
हमें एक ओर
शत्रु को पीछे हटाना है
और दूसरी ओर
देश की फालतू आबादी घटाना है
चल निकला तो वार करेगा
वर्ना दुश्मन की
दस-पांच गोलिया ही बेकार करेगा।”

दूसरे ही क्षण
हम फौजी शान में थे
तीसरे दिन
लड़ाई के मैदान में थे
गोलियाँ सनसना रही थीं
दनदना रही थीं
हवाई जहाज उतर रहे थे
चढ रहे थे
हम आगे बढ रहे थे
हुक्म मिला-“दागो!”
हम समझे-“भागो!”
तभी धमाका हुआ
शायद बम फूटा
हमारी नींद खुल गई
और स्वप्न टूटा।

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By: Shail Chaturvedi

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