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कहारन – वफ़ा बराही की नज़्म

इक कहारन जा रही थी हाथ में गागर लिए
ज़ेर-ए-लब कुछ गुनगुनाती कुछ नज़र नीची किए
मस्त थी उस की अदाएँ ख़ूब था उस का शबाब
आँखें नर्गिस ज़ुल्फ़ सुम्बुल आरिज़-ए-रंगीं गुलाब
आ के पनघट पर किसी से गुफ़्तुगू करने लगी
डाल कर रस्सी को पानी खींच कर भरने लगी
नाज़ से गागर कमर पर रख के घर को जब चली
इक सदा आई कहाँ जाती है ऐ नन्ही कली
सुन के ये आवाज़ फ़ौरन जोश उस को आ गया
आलम-ए-हुस्न-ओ-अदा इस क़हर से थर्रा गया
कुछ सियाही छा रही थी कुछ उजाला था अभी
ये समाँ देखा न था मेरी निगाहों ने कभी

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By: Vafa Barahi

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