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शिकवा – वफ़ा बराही की नज़्म

शब-ए-वस्ल क्यों हैं रुलाने की बातें
करो कुछ तो हँसने हँसाने की बातें
दिल-ए-ना-तवाँ को मनाने की बातें
नहीं हैं नहीं हाथ आने की बातें
मुनासिब है कुछ इंतिज़ाम-ए-मसर्रत
पिलाओ पिलाओ शराब-ए-मोहब्बत

तुम्ही कह दो कुछ हद है ज़ुल्म-ओ-जफ़ा की
वफ़ा की तरह सारी दुनिया है शाकी
कभी ये अदा की कभी वो अदा की
रही शक्ल अबतर दिल-ए-मुब्तला की
नहीं हैं नहीं हैं मोहब्बत की बातें
हक़ीक़त में ये हैं अदावत की बातें

शिकवा

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By: Vafa Barahi

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