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काग़ज़ की नाव – अफ़सर मेरठी की नज़्म

देखो अम्माँ कैसी अच्छी है मिरी काग़ज़ की नाव
ले चला है साथ उस को मेंह के पानी का बहाव
बंद कर देता न मैं सब मोहरियों के मुँह अगर
किस तरह पानी से भर जाता भला फिर सारा घर
मेरी कश्ती तुम ज़रा देखो तो इक चक्कर में है
गो कि दरिया में है लेकिन फिर भी घर के घर में है
मछलियाँ इस वास्ते आँगन के दरिया में नहीं
डर के मेरी नाव से सारी की सारी छुप गईं
अच्छी अम्माँ अब मुझे दरिया में जाने दो ज़रा
अपनी कश्ती को मुझे ख़ुद ही चलाने दो ज़रा
जाऊँगा मैं जब कश्ती सँभाले देखना
तुम कहोगी मेरे नन्हे नाव वाले देखना
मैं कहूँगा मेरी अम्माँ किस तरह देखूँ उधर
क्या करूँगा नाव रस्ते से भटक जाए अगर
ध्यान बट जाए तो कश्ती डूब जाएगी ज़रूर
बैठ कर किस चीज़ में फिर जाऊँगी मैं दूर दूर
अच्छी अम्माँ अब मुझे दरिया में जाने दो ज़रा
अपनी कश्ती को मुझे ख़ुद ही चलाने दो ज़रा
देख लेना तुम कि इस दरिया में डूबूँगा न मैं
अच्छी अम्माँ देर तक पानी में खेलूँगा न मैं

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By: Afsar Merathi

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