loader image

चुप की साज़िश – अमृता प्रीतम की कविता

रात ऊँघ रही है…
किसी ने इन्सान की
छाती में सेंध लगाई है
हर चोरी से भयानक
यह सपनों की चोरी है।

चोरों के निशान—
हर देश के हर शहर की
हर सड़क पर बैठे हैं
पर कोई आँख देखती नहीं,
न चौंकती है।
सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह
एक ज़ंजीर से बँधी
किसी वक़्त किसी की
कोई नज़्म भौंकती है।

चुप की साज़िश

478

Add Comment

By: Amrita Pritam

© 2022 पोथी | सर्वाधिकार सुरक्षित

Do not copy, Please support by sharing!