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कण-कण में है बसता प्रेम

नए सवेरे जैसा उजला,
कड़ी धूप सा जलता प्रेम
कभी साँझ के थके सूर्य सा,
थोड़ा-थोड़ा ढलता प्रेम

कभी क्षितिज जैसा आभासी,
दूर से ही बस दिखता प्रेम
हृदय तले जब अहम् है बहता,
ऊपर-ऊपर बहता प्रेम

सुख के छोटे दिनों का सहचर,
दुःख का सबल सहारा प्रेम
जीत है सकता दुनिया सारी,
अपनों से बस हारा प्रेम

बारिश के पानी सा उथला,
सागर जैसा गहरा प्रेम
शांत मौन का विकल हृदय के
भावों पर, जो पहरा, प्रेम

निश्चल पर्वत सा कठोर है,
कभी मोम सा पिघला प्रेम
मन की सूनी विभावरी में
चाँद के जैसा निकला प्रेम

अलग-अलग रूपों में मिलता,
थोड़ा-सच्चा-झूठा प्रेम
पहचानों-नामों में खोया,
टूटा और समूचा प्रेम

माँ अपने हाथों से खिलाती,
समझो, वही निवाला, प्रेम
पिता के क्रोध ने अपने शब्दों
में जितना कह डाला, प्रेम

जग की है यह अजब पहेली,
सारे बंधन रचता प्रेम
ईश्वर में विश्वास प्रेम है,
कण-कण में है बसता प्रेम!

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By: Anupma Vindhyavasini

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