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ईदगाह – असना बद्र की कविता

हामिद इक नन्हा-सा बच्चा
उसके कोई ना अम्मी-अब्बा
इक दादी ग़ुरबत की मारी
बूढ़ी, बेबस और दुख्यारी
ईद खड़ी थी जिसके सर पर
बिन देखे ये ग़म का लश्कर
दादी पास ना रुपया-पैसा
और हामिद बच्चा नन्हा-सा

फिर भी जैसे-तैसे करके
छः आने जोड़े मर-मर के
तीन आने हामिद की ईदी
बाक़ी का घी और शकर ली
आख़िर हामिद जब घर आता
सब की तरह सिवय्यां खाता

हामिद ईदगाह जब पहुँचा
ईद का मेला हर जानिब था
उसके सारे दोस्त ख़ुशी से
मोल ले रहे थे मर्ज़ी से
चरखी, भिशती, घोड़े, हाथी
राजा, रानी और सिपाही
लट्टू, सीटी, गेंद और झूले
ग़रज़ वहाँ थे ख़ूब खिलौने

हामिद ने ललचाकर सोचा
और फिर दिल बहलाकर सोचा
ये सब हैं बेकार खिलौने
मिट्टी के लाचार खिलौने
टूट जाएँगे घर जाते ही
ख़त्म मिठाई बस खाते ही

दो दिन में फेंके जाएँगे
फिर किससे देखे जाएँगे

हामिद ने फिर समझा परखा
उसके बाद ख़रीदा चिमटा
उसकी दादी, प्यारी दादी
देती उसको खाना-पानी
जलते तवे पे रोटी रखती
हाथ से उसको रोज़ पलटती
चिमटे से अच्छा क्या होगा
काम की शै और पक्का लोहा

यारों ने जब हँसी उड़ायी
हामिद ने भी शान दिखायी
चिमटे को अफ़ज़ल बतलाया
हिकमत से ख़ामोश कराया
धीरे-धीरे ख़ूब हुआ फिर
हर बच्चा मरऊब हुआ फिर

घर पहुँचा तो दादी ग़ुस्सा
देख के उसके हाथ में चिमटा
बोली तुझको कुछ ना सूझा?
दिन भर का तू भूखा प्यासा!

हामिद पूरी बात बताकर
रुका ज़रा-सा, इक लम्हा-भर
दादी ने उसको चिपटाया
आँसू का सैलाब बहाया
ग़ुस्सा बदल गया शफ़क़त में
डूब गया दिल इस चाहत में

नन्हा-सा दिल मचला होगा
हसरत से सब देखा होगा
फिर भी मोल लिया इक चिमटा
इस मासूम ने क्या कर डाला

दादी पर रिक़्क़त तारी थी
हामिद पर हैरत तारी थी!

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By: Asna Badr

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