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बार-बार हारा है

गोआ तट का मैं मछुआरा
सागर की सद्दाम तरंगे
मुझ से कानाफूसी करतीं

नारिकेल के कुंज वनों का
मैं भोला-भाला अधिवासी
केरल का वह कृषक पुत्र हूँ
‘ओणम’ अपना निजी पर्व है
नौका-चालन का प्रतियोगी
मैं धरती का प्यारा शिशु हूँ
श्रम ही जिसकी अपनी पूँजी
छल से जिसको सहज घृणा है
मैं तो वो कच्छी किसान हूँ
लवण-उदधि का खारा पानी
मुझसे बार-बार हारा है…

सौ-हजार नवजात केकड़े
फैले हैं गुनगुन धूप में
देखो तो इनकी ये फुर्ती
वरुण देव को कितनी प्रिय है !
मैं भी इन पर बलि-बलि जाऊँ !
मैं भी इन पर बलि-बलि जाऊँ
मेरी इस भावुकता मिश्रित
बुद्धू पन पर तुम मुसकाओ
पागल कह दो, कुछ भी कह दो
पर मैं भी इन पर बलि-बलि जाऊँ !

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