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एक पिता – कबिन फूकन की कविता

घुप्प अँधेरे में
जंगल की राह
रोके खड़ा था फन फैलाए
एक साँप

द्रुत गति से
लौट रहा था घर को
उसी राह से
बेचारा केंहूराम
और…
वो था एक अड़ियल साँप
दोनों कुछ देर रहे बेख़बर
एक दूसरे से

वे नहीं जानते
यही है जतु-गृह
न समझते हैं
फाँसी-बाज़ार के
अन्धकार का कोलाहल,
अनजान हैं नागासाकि-से ध्वंस
के डर से, और
पम्पिया की प्रलय-कथा से भी

दुश्चिन्ता-ग्रस्त हो मैंने ही
देखा हो दुःस्वप्न शायद
अब इसी ऊहापोह में
हिम-शीतल मैदान में
हो पंछियों का कलरव
या वज्राघात
मेरी बस यही कामना है
सब कुशल-मंगल रहे!

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By: Kabin Phukan

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