loader image

उत्साह – निराला की कविता

बादल, गरजो!–
घेर घेर घोर गगन, धाराधर जो!
ललित ललित, काले घुँघराले,
बाल कल्पना के-से पाले,
विद्युत-छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
वज्र छिपा, नूतन कविता
फिर भर दो:–
बादल, गरजो!
विकल विकल, उन्मन थे उन्मन,
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आये अज्ञात दिशा से अनन्त के घन!
तप्त धरा, जल से फिर
शीतल कर दो:–
बादल, गरजो!

उत्साह

789

Add Comment

By: Suryakant Tripathi (Nirala)

© 2022 पोथी | सर्वाधिकार सुरक्षित

Do not copy, Please support by sharing!