loader image

उमैर मंज़र के चुनिंदा शेर

बढ़ते चले गए जो वो मंज़िल को पा गए
मैं पत्थरों से पाँव बचाने में रह गया


साथी मिरे कहाँ से कहाँ तक पहुँच गए
मैं ज़िंदगी के नाज़ उठाने में रह गया


ये मेरे साथी हैं प्यारे साथी मगर इन्हें भी नहीं गवारा
मैं अपनी वहशत के मक़बरे से नई तमन्ना के ख़्वाब देखूँ


ये तो सच है कि वो सितमगर है
दर पर आया है तो अमान में रख


मरहले और आने वाले हैं
तीर अपना अभी कमान में रख


इस महफ़िल में मैं भी क्या बेबाक हुआ
ऐब ओ हुनर का सारा पर्दा चाक हुआ


तज़्किरा हो तिरा ज़माने में
ऐसा पहलू कोई बयान में रख


यहाँ हम ने किसी से दिल लगाया ही नहीं ‘मंज़र’
कि इस दुनिया से आख़िर एक दिन बे-ज़ार होना था


हर बार ही मैं जान से जाने में रह गया
मैं रस्म-ए-ज़िंदगी जो निभाने में रह गया


सुना ये था बहुत आसूदा हैं साहिल के बाशिंदे
मगर टूटी हुई कश्ती में दरिया पार होना था


उमैर मंज़र के शेर

957

Add Comment

By: Umair Manzar

© 2022 पोथी | सर्वाधिकार सुरक्षित

Do not copy, Please support by sharing!