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दत्तात्रिया कैफ़ी के चुनिंदा शेर

कोई दिल-लगी दिल लगाना नहीं है
क़यामत है ये दिल का आना नहीं है


दैर ओ काबा में भटकते फिर रहे हैं रात दिन
ढूँढने से भी तो बंदों को ख़ुदा मिलता नहीं


इश्क़ ने जिस दिल पे क़ब्ज़ा कर लिया
फिर कहाँ उस में नशात ओ ग़म रहे


वफ़ा पर दग़ा सुल्ह में दुश्मनी है
भलाई का हरगिज़ ज़माना नहीं है


उलझा ही रहने दो ज़ुल्फ़ों को सनम
जो न खुल जाएँ भरम अच्छे हैं


इक ख़्वाब का ख़याल है दुनिया कहें जिसे
है इस में इक तिलिस्म तमन्ना कहें जिसे


नफ़्स को मार कर मिले जन्नत
ये सज़ा क़ाबिल-ए-क़यास नहीं


मा’लूम है वादे की हक़ीक़त
बहला लेते हैं अपने जी को


वो कहा करते हैं कोठों चढ़ी होंटों निकली
दिल में ही रखना जो कल रात हुआ कोठे पर


सच है इन दोनों का है इक आलम
मेरी तन्हाई तेरी यकताई


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By: Dattatreya Kaifi

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