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तुम्हारे दिन लौटेंगे बार-बार

तुम्हारे दिन लौटेंगे बार-बार
मेरे नहीं। तुम देखोगी यह झूमती हरियाली
पेड़ों पर बरसती हवा की बौछार
यह राग-रंग तुम्हारे लिए होंगी चिन्ताएँ
अपरम्पार ख़ुशियों की उलझन तुम्हारे
लिए होगी थकावटें, जंगल का महावट
पुकारेगा तुम्हें बार-बार। फ़ुर्सत ढूँढ़ोगी जब-तब
थकी-हार तब तुम आओगी
पाओगी मुझे झुँझलाओगी
सो जाओगी कड़ियाँ गिनते-गिनते सौ बार।

इसी तरह आएगी बहार
चौंकाते हुए तुम्हें
तुम्हारे दिन।

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By: Doodhnath Singh

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