तुम आओ मर्ग-ए-शादी है न आओ मर्ग-ए-नाकामी
नज़र में अब रह-ए-मुल्क-ए-अदम यूँ भी है और यूँ भी
तुम्हें परवा न हो मुझ को तो जिंस-ए-दिल की परवा है
कहाँ ढूँडूँ कहाँ फेंकी कहाँ देखूँ कहाँ रख दी
खिल गई शम्अ तिरी सारी करामात-ए-जमाल
देख परवाने किधर खोल के पर जाते हैं
साइल देहलवी के शेर
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