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हरित क्रान्ति – धूमिल की कविता

इतनी हरियाली के बावजूद
अर्जुन को नहीं मालूम उसके गालों की हड्डी क्यों
उभर आई है। उसके बाल
सफ़ेद क्यों हो गए हैं।
लोहे की छोटी-सी दुकान में बैठा हुआ आदमी
सोना और इतने बड़े खेत में खड़ा आदमी
मिट्टी क्यों हो गया है।

हरित क्रान्ति

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By: Sudama Pandya 'Dhumil'

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