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सरहद के किनारे से

तुम हर साल ख़ास मौसम में आते हो मुझ तक
और मैं भी एक ख़ास मौसम में हो आती हूँ तुम्हारी धरती पर
एक ही देश की सीमा में
नहीं तो तुम्हारे यहाँ का स्वर्ग मेरे सपनों में ही आता
तुम जानते हो इतना आसान भी नहीं होता
ग़रीब सैलानियों के लिए ये

तुम्हारी धरती नक़्शे के उसी शीर्ष पर है
जहाँ से हमारे आज़ाद देश की हद ख़त्म हो जाती है और जिसे सरहद कहा गया है
एक किनारे से बाँधी गई धरती में ही
तुम व्यस्त रहते हो असीम जीवन में
बुनते रहते हो ज़ाफ़रान के गलीचे
पहाड़ों की बुलंदी, कहवे की खुशबू, हवाओं की ताजगी
और करते रहते हो महीन कसीदेकारी
जीवन की

ख़ैर अब जब हम एक ही देश के वासी हैं
तो हमारा मिलना तय होता है
ख़ास मौसमों में
तुम अपने काँधे पर लादे मेवे, गर्म कपड़ों का गठ्ठड़
कपड़ों की तहों में
अपने बच्चों की शैतानी
तुम्हारी औरतों के दुआ सलाम
और ख़ुद को बचाए रखने के तमाम जतन
मुझ तक पहुंचा ही जाते हो एक लम्बे सफ़र के बाद

मैं बुनावटों में महसूसती रहती हूँ
तुम्हारी धरती की तस्वीर
तुम्हारे मेवों की गर्मी मुझे बताती है कि कैसे एक मुश्किल मौसम में
ज़िन्दा रहा जा सकता है

तुम्हारी आँखों से पता चल जाता है
कि सरहद के किनारे से हद के भीतर की धरती तक भी
तुम्हारा आना
किसी पहाड़ की चढ़ाई करने से ज्यादा कठिन होता है।
आने जाने की तमाम सुविधाओं के बावजूद!

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By: Anuradha Ananya

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